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Showing posts from 2014

मैं नीर भरी दुख की बदली - महादेवी वर्मा

वेदना और मर्म की कवयित्री महादेवी जी का छायावादी कवियों में प्रमुख स्थान है। छायावाद चतुष्टयी में प्रसाद, पन्त और निराला के बाद उन्हीं का नाम आता है। उनके काव्य में उस अज्ञात प्रियतम के लिए तड़प और उससे दूर होने की पीड़ा सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है। यह दर्द, यह पीड़ा कवयित्री के मन में इस तरह रच-बस गई है कि उसे सम्पूर्ण सृष्टि इसी पीड़ा में ही सिमटी हुई लगती है। वह तड़पकर कह उठती है- "तुझको पीड़ा में ढूँढा, तुझमें ढूँढूँगी पीड़ा"। अनुभूतियों के इसी उत्कर्ष ने उन्हें रहस्यवाद की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री बना दिया।आइए पढ़ते हैं उनकी यह कविता-

मैं नीर भरी दुख की बदली!

स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झणी मचली!

मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वासों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली!

बाँधो न नाव इस ठाँव बंधु! - सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!
पूछेगा सारा गाँव, बंधु!

यह घाट वही जिस पर हँसकर,
वह कभी नहाती थी धँसकर,
आँखें रह जाती थीं फँसकर,
कँपते थे दोनों पाँव बंधु!


वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
देती थी सबके दाँव, बंधु!

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!
पूछेगा सारा गाँव, बंधु!



image courtesy: Google

मनुष्यता - मैथिलीशरण गुप्त

विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी।
हुई न यों सु-मृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,
मरा नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।
यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप-आप ही चरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती,
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती,
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
अखंड आत्म भाव जो असीम विश्व में भरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

लघुकथा - जवाहर चौधरी

रोज अंधेरा होते ही एक उल्लू  मंदिर के गुंबद पर बैठ जाता। परेशान  लोग अपशगुन मान कर उसे उड़ाते लेकिन वह हठी, उड़ जाता पर कुछ देर बाद वापस लौट आता। एक बार देर रात उसे मौका मिल गया। जगदीश्वर  खुली हवा में टहल रहे थे, वह उनके सामने आया, --‘‘ मेरी समस्या का समाधान कीजिए जगदीश्वर।’’‘‘ पूछो लक्ष्मीवाहक, क्या बात है ?’’‘‘ जगदीश्वर, मेरे पुरखे आस्ट्रेलिया  के थे इसलिए वे आस्ट्रेलियन  कहलाए। मेरे कुछ बंधु जर्मनी में हैं वे जर्मन कहलाते हैं। अमेरिका में रहने वाले मेरे भाई अमेरिकन हैं। तो में हिन्दुस्तान में रहने वाला हिन्दू क्यों नहीं हूं !?’’जगदीश्वर मुस्कराए, बोले -‘‘ तुम हिन्दुस्तान में हो इसलिए बेशक हिन्दुस्तानी हो। लेकिन हिन्दू नहीं उल्लू हो। .....  हिन्दुस्तानी उल्लू ।’’

ग़ज़ल- गुलशन बावरा

किसी पे दिल अगर आ जाए तो क्या होता हें ?
वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
कोई दिल पे अगर छा जाए तो क्या होता है ?
वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
मुझ को जुल्फ़ों के साए में सो जाने दो सनम
हो रहा है जो दिल मे हो जाने दो सनम
बात दिल की दिल में रह जाए, तो फ़िर क्या होता है ?
वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
क्या मंज़ूर है ख़ुदा को बताओ तो ज़रा
जान जाओगी बाहों में आ जाओ तो ज़रा
कोई जो बाहों में आ जाए तो फ़िर क्या होता है ?
वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है

हिंदी की दुर्दशा - काका 'हाथरसी'

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य
सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य
है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा-
बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा
कहँ ‘ काका ‘ , जो ऐश कर रहे रजधानी में
नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस
हिंदी पढ़नी होये तो, जाओ बेटे रूस
जाओ बेटे रूस, भली आई आज़ादी
इंग्लिश रानी हुई हिंद में, हिंदी बाँदी
कहँ ‘ काका ‘ कविराय, ध्येय को भेजो लानत
अवसरवादी बनो, स्वार्थ की करो वक़ालत

कोई दीवाना कहता है-डॉ. कुमार विश्वास

आधुनिक हिंदी काव्य में लोकप्रिय कवि एवं राजनेता कुमार विश्वास का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं।आइए आज पढ़ते हैं उनकी बहुचर्चित रचना "कोई दीवाना कहता है"-

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को, बस बादल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है
ये तेरा दिल समझता है, या मेरा दिल समझता है मोहब्बत एक एहसासों की, पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था, कभी मीरा दीवानी है
यहाँ सब लोग कहते है, मेरी आँखों में आंसू है
जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है

हिंदी महीने

हिंदी महीनों के नाम सम्बंधित नक्षत्रों के आधार पर रखे गए हैं। जैसे चित्रा से चैत्र, विशाखा से वैशाख, ज्येष्ठा से ज्येष्ठ। प्रत्येक माह में 15-15 दिनों के दो पक्ष होते हैं-
शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
प्रस्तुत है सूची-

मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ-गोपालदास 'नीरज'

मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो!
हैं फूल रोकते, काँटे मुझे चलाते,
मरुस्थल, पहाड़ चलने की चाह बढ़ाते,
सच कहता हूँ मुश्किलें न जब होती हैं,
मेरे पग तब चलने में भी शरमाते,
मेरे संग चलने लगें हवाएँ जिससे,
तुम पथ के कण कण को तूफान करो।

चंद अशआर

1-खुद जल के ज़माने को जो रोशन करते हैं
अपने अरमानों के सर अपने हाथों कलम करते हैं
कब रूह भी अपनी बेखबर बिक जाए
इसलिए अपने कंधे पर कफन रखते हैं
न दौलत के जाम हैं न जमीं के सौदे
इस जहाँ को कठपुतलियों का चमन कहते हैं
अफ़सोस ये दरिन्दे उन परिंदों के पर को भी नहीं बख्शते
जो दिलों में बस पैगाम-ए-वफ़ा ले के उड़ते हैं

युग-परिवर्तन

अभिजीत'मानस' यह कैसा नवयुग है आया
कैसा परिवेश उपस्थित है
जैसे रावण की नगरी में
राम की सीता स्थित है

लघुकथा-एक भूख तीन प्रतिक्रियाएँ

डॉ. हेमंत कुमार शहर का एक प्रमुख पार्क।पार्क के बाहर गेट पर बैठा हुआ एक
अत्यन्त बूढ़ा भिखारी।बूढ़े की हालत बहुत दयनीय थी।
पतला दुबला, फ़टे चीथड़ों में लिपटा हुआ।पिछले चार दिनों से
उसके पेट में सिर्फ़ दो सूखी ब्रेड का टुकड़ा और एक कप चाय
जा पायी थी।बूढ़ा सड़क पर जाने वाले हर व्यक्ति का ध्यान
आकर्षित करने के लिये हाँक लगाता....“खुदा के नाम पर—एक
पैसा इस गरीब को—भगवान भला करेगा”।सुबह से उसे अब तक
मात्र दो रूपया मिल पाया था,जो कि शाम को पार्क
का चौकीदार किराये के रूप में ले लेगा।
अचानक पार्क के सामने एक रिक्शा रुका।उसमें से बॉब
कट बालों वाली जीन्स टॉप से सजी एक युवती उतरी।

गज़ल-उस शाम वो रुखसत का समाँ

इब्ने-इंशा उस शाम वो रुखसत का समाँ याद रहेगा।
वो शहर, वो कूचा, वो मकाँ  याद रहेगा।।
वो टीस कि उभरी थी इधर  याद रहेगा,
वो दर्द  कि उट्ठा था उधर याद रहेगा।
हाँ बज़्मे-शबाना में हमाशौक़ जो उस दिन,
हम थे तेरी जानिब निगराँ  याद रहेगा।
कुछ 'मीर' के अबियात थे कुछ फ़ैज़ के मिसरे,
इक दर्द का था जिनमें बयाँ,  याद रहेगा।
हम भूल सके हैं न तुझे भूल सकेंगे,
तू याद रहेगा हमें हाँ याद रहेगा।

मायने-
बज़्मे-शबाना = रात की महफ़िल
हमाशौक़ = शौक़ के साथ
निगराँ = दर्शक
अबियात = शे'र 
मिसरे = कविता की पंक्तियाँ

घाघ की कहावतें

घाघ भारत के लोक-कवि हैं जिनकी कहावतें आज भी किसानों के बीच खूब लोकप्रिय हैं। आइए पढ़ते हैं उनकी कुछ लोकप्रिय  कहावतें-

प्रातकाल खटिया ते उठि कै पियै तुरतै पानी।
कबहूँ घर मा बैद न अइहैं बात घाघ कै जानी।।


रहै निरोगी जो कम खाय।
बिगरै न काम जो गम खाय।।


सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात।
बरसै तो झूरा परै, नाहीं समौ सुकाल।।


शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।
कहैं घाघ सुन घाघनी, बिन बरसे ना जाय।।

हिंदी की सर्वश्रेष्ठ प्रेम कहानी-'उसने कहा था'

चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी'
बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जबान के कोड़ों से
जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गए हैं, उनसे
हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बू कार्ट
वालों की बोली का मरहम लगावे। जबकि बड़े
शहरों की चौड़ी सड़को पर घोड़े की पीठ को चाबुक से धुनते
हुए इक्के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट यौन-संबंध
स्थिर करते हैं, कभी उसके गुप्त गुह्य अंगो से डाक्टर को लजाने
वाला परिचय दिखाते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखो के
न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरो की अंगुलियों के
पोरों की चींथकर अपने ही को सताया हुआ बताते हैं और
संसार भर की ग्लानि और क्षोभ के अवतार बने नाक
की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग
चक्करदार गलियों मे हर एक लडढी वाले के लिए ठहर कर सब्र
का समुद्र उमड़ा कर-- बचो खालसाजी, हटो भाईज',
ठहरना भाई, आने दो लालाजी, हटो बाछा कहते हुए सफेद
फेटों , खच्चरों और बतको, गन्ने और खोमचे और भारे वालों के
जंगल से राह खेते हैं । क्या मजाल है कि जी और साहब
बिना सुने किसी को हटना पड़े। यह बात
नही कि उनकी जीभ चलती ही नही, चलती है पर
मीठी छुरी की तरह म…

जो बीत गई-हरिवंश राय बच्चन

जो बीत गई सो बात गई ! जीवन में एक सितारा था, माना, वह बेहद प्यारा था, वह डूब गया तो डूब गया; अंबर के आनन को देखो, कितने इसके तारे टूटे, कितने इसके प्यारे छूटे, जो छूट गए फिर कहाँ मिले; पर बोलो टूटे तारों पर कब अंबर शोक मनाता है ! जो बीत गई सो बात गई !

पुष्प की अभिलाषा

चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ।
चाह नहीं सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूँ, भाग्य पर इतराऊँ मुझे तोड़ लेना बनमाली! उस पथ पर देना तुम फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक।                                                'माखनलाल चतुर्वेदी'

ग़ज़ल-ख़ुमार बाराबंकवी

एक पल में एक सदी का मज़ा हमसे पूछिए, दो दिन की ज़िन्दगी का मज़ा हमसे पूछिए। भूले हैं रफ़्ता-रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम, किश्तों में ख़ुदकुशी का मज़ा हमसे पूछिए। आगाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए, अंजाम-ए-आशिक़ी का मजा हमसे पूछिए। जलते दियों में जलते घरों जैसी लौ कहाँ, सरकार-ए-रोशनी का मज़ा हमसे पूछिए। वो जान ही गए कि हमें उनसे प्यार है, आँखों की मुखबिरी का मज़ा हमसे पूछिए। हँसने का शौक हमको भी था आपकी तरह, हँसिए मगर हँसी का मज़ा हमसे पूछिए।
'ख़ुमार बाराबंकवी'

'हिंदी' का उद्भव

यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि 'हिंदी' शब्द की व्युत्पत्ति में भारतीय नहीं अपितु वैदेशिक कारक उत्तरदायी हैं।'सिन्धु' शब्द का भारतवर्ष से गहरा सम्बन्ध है।भारत की पहचान में सिन्धु का भी अपना स्थान रहा है।जब ईरान के लोग भारत आए तो उन्होंने सिन्धु को हिन्दु कहना आरंभ कर दिया क्योंकि फ़ारसी में 'स' वर्ण का उच्चारण 'ह' के रूप में किया जाता है।इस प्रकार सिन्धु परिवर्तित होकर हिंदु और सिन्धु प्रदेश के निवासी हिंदु या हिन्दू हो गए।हिन्दू का अर्थ हुआ हिन्द का रहने वाला और हिंदी का मतलब हिन्द का।स्पष्टतः इनकी भाषा भी हिन्दवी या हिंदी बोली जाने लगी।समय के साथ आर्यावर्त और भारतवर्ष के साथ हिंदुस्तान शब्द का भी प्रयोग होने लगा।"हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान" के मूल में यही तथ्य विद्यमान है।      हिंदी भाषा का जन्म कब हुआ इस संबंध में यद्यपि निश्चित रूप से कुछ कह पाना मुश्किल है तथापि यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि हिंदी भाषा का प्रयोग सातवीं शताब्दी के आसपास ही आरंभ हो गया था। माना जाता है कि हिंदी का सर्वप्रथम प्रयोग अमीर खुसरो ने किया।उन्होंने गयासुद्दीन तुगलक…

अनुभूति

ऐ मेरे दोस्त
तेरा आना भी बेकार
तेरा जाना भी बेकार
तुम आए तो दिल ने अहिस्ता ये पूछा था
तुम्हारे आने की ज़रूरत क्या थी
जो मेरी रूह तक समाया हो
उसे और करीब लाने की ज़रूरत क्या थी
और अब
जबकि तुम जा रहे हो
धडकनें एक मासूम सा सवाल करती हैं
क्या जाना जरुरी है?
Image courtesy: myhonysplace.com

चार वेद, छ: शास्त्र, अठारह पुराण

सनातन धर्म का आधार अग्रोल्लिखित साहित्य समुच्चय है जिसका लोहा पूरा विश्व मानता है।

चार वेद-


ऋग्वेदसामवेदयजुर्वेदअथर्ववेद
(विशेष:ऋग्वेद को विश्व के पुरातनतम साहित्य का गौरव प्राप्त है)

छ:शास्त्र-
शिक्षाकल्पव्याकरणनिरुक्तछंदज्योतिष
अठारह पुराण-


विष्णुभागवतनारदगरुड़पद्मवाराहब्रह्मब्रह्माण्डब्रह्म-वैवर्तमार्कंडेयभविष्यवामनवायुलिंगस्कन्दअग्निमत्स्यकूर्म
इसमें  निम्नलिखित सामग्री और जोड़ दी जाए तो विश्व का कोई भी पुस्तकालय इसकी बराबरी कर पाने में सक्षम नहीं होगा और कोई भी प्रश्न अनुत्तरित नहीं रहेगा।वह है-
श्रीमद्भगवद्गीता और
रामचरितमानस


हमें गर्व है हम भारतीय हैं।
Image courtesy: www.google.com ww.vedpradip.com
आधुनिक संत और धर्माचार्य अपना 'उद्धार' करने में तो सफल हो जाते हैं किन्तु अन्य किसी का कदापि नहीं। वर्तमान समाज में व्याप्त धार्मिक विकृतियों और विद्रूपताओं के लिए ये तथाकथित धर्मोद्धारक कम उत्तरदायी नहीं हैं।इस समय चतुर्दिक धर्म का विकृत रूप दृष्टिगोचर होता है।सर्वत्र धार्मिक कट्टरता, दुराग्रह, और अन्य धर्मों के प्रति विद्वेष की भावना ही परिलक्षित होती है।ये धर्म के ठेकेदार धर्म के नाम पर समाज को जोड़ने का नहीं अपितु तोड़ने का कम कर रहे हैं, जिसके लिए हमें जागरूक होने की आवश्यकता है।ये समाज में अकर्मण्यता को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं।वर्तमान समय में धर्मोपदेश मात्र से किसका कितना कल्याण हो रहा है यह तो कह पाना मुश्किल है, किन्तु प्रवचन सभाओं में उमड़ने वाली भारी भीड़ यह आभास अवश्य कराती है कि देश की जनशक्ति का कितना अपव्यय हो रहा है!

वफ़ा के शहर में

वफ़ा के शहर में तेरी गली बदनाम लिख दूँगा,
साँसों की सदा पर मौत का पैग़ाम लिख दूँगा ।
उठेगा दर्द जब दिल में  तुम्हारे वास्ते 'पंकज',
उमीदों की चिता पर बस तुम्हारा नाम लिख दूँगा।।

हिंदी भाषा की विशेषताएँ

हमारी हिंदी हिंदी का उद्भव भाषाओं की जननी संस्कृत से हुआ है जो आज  तकनीकी क्षेत्र में प्रयोग के लिए सर्वाधिक उपयुक्त भाषा मानी जा रही है.हिंदी के व्याकरणिक नियम प्रायः अपवाद-रहित हैं इसलिए आसान हैं.हिंदी की वर्णमाला दुनिया की सर्वाधिक व्यवस्थित वर्णमाला है.हिंदी की लिपि (देवनागरी) विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है.हिंदी का शब्दकोष बहुत विशाल है और एक-एक भाव को व्यक्त करने के लिए सैकड़ों शब्द हैं.हिंदी दुनिया की दुनिया की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है.हिंदी अखिल भारत और दुनिया के कई देशों (अमेरिका सहित) में बोली और समझी जाने वाली भाषा है.हिंदी दुनिया की सर्वाधिक तीव्रता से प्रसारित हो रही भाषाओं में से एक है.हिंदी सबसे सरल और लचीली भाषा है.ऐसे समय में जब सारी दुनिया की निगाहें भारत की ओर लगी हैं, भारत के विकास के साथ ही दुनिया में हिंदी का महत्व बढ़ना भी निश्चित है.देश को पुन: विश्वगुरु बनाने के साथ ही हिंदी को भी विश्वभाषा बनाएँ.कृपया मातृभाषा का प्रयोग करें; हिंदी का प्रयोग करें.
Image courtesy:ashokvichar.blogspot.com