Posts

Showing posts from 2017

प्यार को दोस्ती बताता हूँ

प्यार को दोस्ती बताता हूँ।
झूठ यूँ दिल से बोल जाता हूँ।।
जब भी सोचूँ उसे तन्हाई में।
बाख़ुदा खुद को भूल जाता हूँ।।
उसकी बातें जो याद आती हैं।
मैं अकेले में मुस्कुराता हूँ।।
कभी हारूँ नहीं मैं दिल अपना।
हाँ मगर दिल से हार जाता हूँ।।
आँच आये न उसके दामन पर।
ख़ुदी की लौ में सुलग जाता हूँ।।

बालकृष्ण द्विवेदी 'पंकज'

जब तुम्हारा दुपट्टा सरकता था

"तूने मेरी मोहब्बत की गहराईयों को समझा ही नहीं सनम..!
तेरे बदन से जब दुपट्टा सरकता था हम नज़रें झुका लेते थे..!!"

  ऐसे ही कहीं कुछ पढ़ रहा था और नज़र पड़ गयी इन पंक्तियों पर।
प्रथमदृष्टया कोई भी इसे उस सस्ती शेरो-शायरी की श्रेणी में रख सकता है जो ट्रैक्टर की ट्रॉलियों से लेकर बड़े बड़े ट्रकों के आगे-पीछे अक्सर लिखी मिल जाती हैं या फिर चाट-पकौड़ी के ठेले अथवा किसी आशिक़ मिज़ाज नाई की दुकान के किसी कोने में लगी नेहा धूपिया टाइप हिरोइन के अर्धनग्न चित्र के साथ छपी हुई। लेकिन इन पंक्तियों को आप दोबारा पढ़िए आपको एहसास हो जाएगा कि ये वास्तव में इन सबसे कुछ अलग हैं। इसकी भाव-भूमि वह है जिस तक आजकल के हनी सिंह टाइप लौंडे तो नहीं ही पहुँच सकते।
खैर, हम आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं आज के सोशल मीडिया के ज़माने की जहाँ हर कोई अपने आपको खुसरो, ज़ौक़, मीर, ग़ालिब और दुष्यंत कुमार समझता है। जहाँ कॉपी-पेस्ट की कला सीख लेना ही शायर हो जाने की गारण्टी है और जहाँ पहली पंक्ति का तुक दूसरी पंक्ति से मिल जाना ही शायरी मानी जाती है।
अभी कुछ ही दिन पहले की बात है हमारे एक फेसबुकिया मित्र की कालजयी पंक्तियाँ …

दर्द की इन्तहा

दर्द की इन्तहा हुई फिर से।
लो तेरी याद आ गयी फिर से।। फिर कहाँ चढ़ रहा है रंग-ए-हिना, कहाँ बिजली सी गिर गयी फिर से।। बंदिशें तोड़ के, ठुकरा के लौट आया है, दिल को ग़फ़लत सी हो गयी फिर से।। वही ख़ुशबू जो बस गयी है मेरे सीने में, अश्क़ बनकर छलक उठी फिर से।।
बाल कृष्ण द्विवेदी 'पंकज'

ग़मों में मुस्कुराना

परिन्दे आँधियों में आशियाना ढूँढ़ लेते हैं !
बंजारे कहीं भी इक ठिकाना ढूँढ़ लेते हैं !!
ग़मों की राह के हम भी मुसाफ़िर थे, मुसाफ़िर हैं,
ग़मों में भी मगर अब मुस्कुराना ढूँढ़ लेते हैं !!

बालकृष्ण द्विवेदी 'पंकज'
सम्पर्क सूत्र: +91-9651293983

लोग मिलते हैं सवालों की तरह

दोस्तों, बहुत लम्बा वक़्त गुज़र गया. अब सोचता हूँ तो लगता है  कैसे गुज़र गया पता ही नहीं चला.यह बात दीगर कि बीतते हुए को बिताना बड़ा मुश्किल है. 
खैर ये तो ज़िन्दगी की कश्मकश है जो चलती ही रहनी है. मलाल इस बात का है कि इस भागदौड़ में आपसे रूबरू होने का मौका न मिल पाया. हालाँकि इसमें मेरी लापरवाही भी एक वजह हो सकती है. कोशिश रहेगी कि आगे से ऐसा न होने पाए. ये सिलसिला यूँ ही चलता रहे इस उम्मीद के साथ चन्द पंक्तियाँ आप की सेवा में ...


ख़्वाब जलते हैं चरागों की तरह ! लोग मिलते हैं सवालों की तरह!! रोशनी रोशनी में जलती है, धुन्ध रहती है हिजाबों की तरह!! वरक़ पलटूँ तो हर्फ़ कहते हैं, ज़िन्दगी यूँ कभी खिलती थी गुलाबों की तरह!!
बाल कृष्ण द्विवेदी 'पंकज'