जब भी हिंदी साहित्य के इतिहास में 'रीतिकाल' या श्रृंगार रस की बात आती है, तो एक नाम सबसे ऊपर चमकता है—कवि बिहारीलाल।
बिहारी के बारे में एक प्रसिद्ध कहावत है, "सतसैया के दोहरा, ज्यों नाविक के तीर। देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर।" इसका मतलब है कि उनके दोहे भले ही देखने में सिर्फ दो लाइन के होते हैं, लेकिन उनका अर्थ इतना गहरा होता है कि सीधे दिल पर चोट करता है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि बिहारी के इसी हुनर ने एक बार एक पूरे साम्राज्य को डूबने से बचा लिया था? आज की इस पोस्ट में हम बिहारी के जीवन के उसी दिलचस्प किस्से और उनकी अनोखी काव्य-शैली को समझेंगे।
जब राजा 'नई रानी' के प्रेम में राजपाट भूल गए...
यह किस्सा जयपुर (आमेर) के राजा जयसिंह के समय का है। राजा जयसिंह का नया-नया विवाह एक अत्यंत कम उम्र की राजकुमारी से हुआ था। राजा अपनी नई रानी के प्रेम में इस कदर खो गए कि उन्होंने महल से बाहर निकलना ही बंद कर दिया। वे न तो राजदरबार जाते थे और न ही प्रजा के सुख-दुख की सुध लेते थे।
मंत्रियों से लेकर प्रजा तक, सब परेशान थे। लेकिन राजा को टोकने की हिम्मत किसी में नहीं थी, क्योंकि राजा को ज्ञान देने का मतलब था—सीधे मौत की सजा!
बिहारी की चालाकी और वो 'एक ऐतिहासिक दोहा'
तभी जयपुर दरबार में कवि बिहारी का आगमन हुआ। जब उन्हें इस बात का पता चला, तो उन्होंने सीधे राजा से लड़ने या उपदेश देने के बजाय, अपनी कविता को हथियार बनाया। उन्होंने एक पर्चे पर एक दोहा लिखा और किसी तरह उसे राजा के शयनकक्ष (कमरे) तक भिजवा दिया।
वह दोहा था:
नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहि काल।
अली कली ही सौं बंध्यौ, आगे कौन हवाल॥
इसका सीधा और कड़वा अर्थ था: "हे राजन! अभी तो इस कली (रानी) में न तो पराग है और न ही यह मीठी मधु (शहद) बनी है। अभी तो इसका पूरी तरह विकास भी नहीं हुआ है। अगर आप अभी से इस कली के प्रेम में भौंरे की तरह बंध गए, तो आगे चलकर इस राज्य का क्या हाल होगा?"
दोहे का जादू और राजा की वापसी
इस दोहे ने राजा जयसिंह की आँखों पर बंधी मोह की पट्टी को एक झटके में खोल दिया। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ, वे तुरंत दरबार में लौटे और दोबारा राजपाठ संभाल लिया। वे बिहारी की इस कला से इतने खुश हुए कि उन्होंने हर एक दोहे पर बिहारी को 'एक सोने की अशर्फी' (मुद्रा) देने का वादा किया।
बिहारी के काव्य की खास बातें (गागर में सागर)
बिहारी ने अपने जीवन में केवल एक ही ग्रंथ लिखा—'बिहारी सतसई'। इसमें लगभग 700 दोहे हैं, लेकिन यही एक किताब उन्हें अमर बनाने के लिए काफी थी। उनके काव्य में ये तीन चीजें अद्भुत हैं:
गागर में सागर भरना: दो लाइनों के भीतर पूरी कहानी या गहरा दर्शन कह देना बिहारी की सबसे बड़ी ताकत थी।
श्रृंगार और भक्ति का मेल: उनके दोहों में केवल प्रेम ही नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण की सुंदर भक्ति के दर्शन भी होते हैं।
प्रकृति चित्रण: उन्होंने मौसम और प्रकृति के बदलते रूपों को इंसानी भावनाओं से बहुत खूबसूरती से जोड़ा है।
आज के दौर में इसका क्या सबक है?
बिहारी का जीवन हमें सिखाता है कि अपनी बात को कड़वे शब्दों में चिल्लाकर कहने के बजाय, अगर सही तरीके और प्रभावशाली ढंग से (कलात्मक रूप से) कहा जाए, तो बड़े से बड़े इंसान को भी बदला जा सकता है। शब्दों में बहुत ताकत होती है, बशर्ते हमें उनका सही इस्तेमाल करना आता हो।
आपकी पसंदीदा रचना कौन सी है?
क्या आपने बिहारी का कोई दोहा पहले कभी सुना या पढ़ा है? कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं!

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