हार नहीं मानूँगा, रार नई ठानूँगा - स्मृतिशेष श्री अटल बिहारी बाजपेयी

मन व्यथित है!
माना कि अब आप राजनीति में सक्रिय नहीं थे लेकिन आपका होना ही बहुत से राजनैतिक संकटों, बाधाओं और दुष्प्रेरणाओं को दूर रखे हुए था। आपके कभी "हार न मानने" वाले अटल इरादे और संकल्प की प्रतिच्छाया "स्वर्णिम चतुर्भुज" के सदृश समस्त भारतवर्ष को अब तक आच्छादित किये हुए थी। आपका चले जाना एक परिपाटी का अंत है, एक संकल्पना का अंत है, एक युग का अंत है।

लोगों के लिए आप राजनेता रहे होंगे, पत्रकार रहे होंगे, साहित्यकार रहे होंगे, प्रगल्भ वक्ता रहे होंगे, भाषाविद रहे होंगे; किंतु मेरे लिए आप एक सजीव शास्त्र थे जिसका एक-एक अध्याय मुझे अभिप्रेरित करता था, ऊर्जस्वित करता था।

आप तो चले गए लेकिन "काल के कपाल पर" लिखा आपका "नया गीत" अमिट है और संसृति के एक-एक "परमाणु" पर गुंजायमान है। राजनैतिक संकीर्णता से इतर उस विराट सत्ता में आप अचल हैं। आप अटल हैं!

पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी bharat ratna ex prime minister of india Atal bihari bajpayee
मैं अटल हूँ, मैं सत्य हूँ, मैं सबके दिलों में रहूँगा



भारतीय राजनीति के अजातशत्रु, हिन्दी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर, भारतरत्न स्व0 अटल बिहारी वाजपेयी को विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए उनकी कुछ कविताएँ-


अटल जी की कुछ कविताएँ


गीत नया गाता हूं

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर,

पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर,

झरे सब पीले पात कोयल की कुहुक रात,

प्राची में अरुणिम की रेख देख पता हूं।

गीत नया गाता हूं।।

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी,

अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी,

हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं।

गीत नया गाता हूं।।






आओ मन की गांठे खोलें

यमुना तट, टीले रेतीले,

घास-फूस का घर हांडे पर

गोबर सी लीपे आंगन में

तुलसी का बिरवा, घंटी स्वर

मां के मुंह से रामायण के

दोहे-चौपाई रस घोले

आओ मन की गांठे खोलें।

बाबा की बैठक में बिछी चटाई

बाहर रखे खड़ाऊं

मिलने वाले के मन में असमंजस

जाऊं या ना जाऊं

माथे तिलक नाक पर ऐनक

पोथी खुली स्वयं से बोलें

आओ मन की गांठे खोलें।

सरस्वती की देख साधना

लक्ष्मी ने संबंध न जोड़ा

मिट्टी ने माथे का चंदन

बनने का संकल्प न छोड़ा

नए वर्ष की अगवानी में

टुक रुक लें, कुछ ताजा हो लें

आओ मन की गांठे खोलें।





आओ फिर से दिया जलाएं

भरी दुपहरी में अंधियारा

सूरज परछाईं से हारा

अंतरतम का नेह निचोड़ें

बुझी हुई बाती सुलगाएं

आओ फिर से दिया जलाएं।

हम पड़ाव को समझें मंजिल

लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल

वर्तमान के मोहजाल में

आने वाला कल न भुलाएं

आओ फिर से दिया जलाएं।

आहूति बाकी यज्ञ अधूरा

अपनों के विघ्नों ने घेरा

अंतिम जय का वज्र बनाने

नव दधीचि हड्डियां गलाएं

आओ फिर से दिया जलाएं।





बाधाएं आती हैं आएं,

घिरें प्रलय की घोर घटाएं,

पावों के नीचे अंगारे,

सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,

निज हाथों में हंसते-हंसते,

आग लगाकर जलना होगा

कदम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफानों में,

अगर असंख्यक बलिदानों में,

उद्यानों में, वीरानों में,

अपमानों में, सम्मानों में,

उन्नत मस्तक, उभरा सीना,

पीड़ाओं में पलना होगा।

कदम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,

कल कहार में, बीच धार में,

घोर घृणा में, पूत प्यार में,

क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

जीवन के शत-शत आकर्षक,

अरमानों को ढलना होगा।

कदम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,

प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,

असफल, सफल समान मनोरथ,

सब कुछ देकर कुछ न मांगते,

पावस बनकर ढलना होगा।

कदम मिलाकर चलना होगा।

कुछ कांटों से सज्जित जीवन,

प्रखर प्यार से वंचित यौवन,

नीरवता से मुखरित मधुबन,

परहित अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में,

जलना होगा, गलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।

  

मौत से ठन गई!



ठन गई!
मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूं?
तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।
मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है।
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफां का, तेवरी तन गई।
मौत से ठन गई!

Ghazal | मैं अपने साथ ग़ज़ल की किताब रखता हूँ

पेश है एक नई ग़ज़ल बिल्कुल नए अंदाज़ में-


लब पे शबनम मगर सीने में आग रखता हूँ।
हर एक सवाल का सीधा जवाब रखता हूँ।।
रोक ले मुझको ज़माना ये कहाँ मुमकिन है,
मैं अपने दिल में जज़्ब-ए-इंक़लाब रखता हूँ।।
उनसे कह दो कि भूल जायें मुक़ाबिल होना।
मैं अब चराग़ों की जगह आफ़ताब रखता हूँ।।
उनकी रुसवाइयों का और ग़िला क्या करना।
बस अपने साथ ग़ज़ल की किताब रखता हूँ।।

हिंदी भाषा में रोजगार (करियर) | Career in Hindi

हिंदी भाषा में रोजगार के अवसर carreer in hindi language

Career in Hindi Language हिंदी में करियर (रोजगार) की अपार संभावनाएँ हैं। इस समय अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ हिंदी का अध्ययन करने वाले युवा अपना भविष्य सँवार सकते हैं। आज हम इसी विषय पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

हिंदी दुनिया की दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। इस समय दुनियाभर में हिंदी बोलने वालों की संख्या ५५ करोड़ से अधिक है वहीं हिंदी समझ सकने वाले लोगों की संख्या १ अरब से भी ज्यादा है। प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, इंटरनेट, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच और संस्थाओं में हिंदी के प्रयोग में गुणात्मक वृद्धि हुई है। फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब तथा व्हाट्सएप जैसे अनुप्रयोगों में तो अब हिंदी का ही दबदबा है। गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी दिग्गज कंपनियों ने भी हिंदी में बहुत बड़े पैमाने पर काम करना शुरू कर दिया है। 

आइए नजर डालते हैं उन तमाम क्षेत्रों पर जिसमें हिंदी पढ़ने वाले छात्र अपना भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं साथ ही अपनी राष्ट्रभाषा के संवर्धन का पुण्य भी प्राप्त कर सकते हैं।

पत्रकारिता (Journalism)


हिंदी का अध्ययन करने वाले छात्रों के बीच पत्रकारिता  रोजगार का एक आकर्षक विकल्प है जहाँ मेहनती और प्रतिभावान युवाओं के लिए बहुत संभावनाएँ हैं। इस समय सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले समाचार पत्रों और सबसे ज्यादा देखे जाने वाले समाचार चैनलों में दो तिहाई से अधिक हिंदी भाषा के ही हैं। समाचार चैनलों और अखबारों के अलावा भी हिंदी के अनेक चैनल और पत्र-पत्रिकाएँ हैं जो सुयोग्य युवाओं के स्वागत में तैयार खड़े हैं।
इस क्षेत्र में सफल होने के लिए आवश्यक है कि भाषा पर आपकी पकड़ बहुत अच्छी हो और आप अपनी बातों को सरलता और सहजता से अभिव्यक्त कर सकें जिसमें हिंदी भाषा और साहित्य का अध्ययन विशेष लाभप्रद है। पत्रकारिता में आने की इच्छा रखने वाले युवाओं को अपने आसपास घटित होने वाली घटनाओं के प्रति सजग और संवेदनशील होना भी बहुत जरूरी होता है।

राजभाषा अधिकारी (Rajbhasha Officer)


केंद्रीय संस्थानों और कार्यालयों में राजभाषा अधिकारी की नियुक्ति की जाती है जो अपने यहाँ हर प्रकार से हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देते हैं और हिंदी में कामकाज को सुगम बनाते हैं। यदि आप हिंदी विषय में परास्नातक हैं और स्नातक स्तर पर एक विषय के रूप में अंग्रेजी का भी अध्ययन किया है तो राजभाषा अधिकारी के रूप में आप अपने करियर को पंख लगा सकते हैं। यहाँ आपको ऊँचे वेतनमान के साथ हिंदी भाषा के क्षेत्र में कार्य करने का अच्छा अवसर मिलता है।

अध्यापन (Teaching)


हिन्दी का अध्ययन करने वालों के बीच अध्यापन एक पारंपरिक करियर विकल्प के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ उच्च शिक्षण संस्थानों से लेकर प्राथमिक स्तर तक शिक्षण के अवसर योग्यतानुसार उपलब्ध रहते हैं और इसे सदाबहार करियर माना जाता है। हिन्दी विषय में परास्नातक करने के उपरांत समय-समय पर आयोजित होने वाली 'राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा' (NET) में सम्मिलित हुआ जा सकता है। इसमें अधिकतम अंक प्राप्त करने वालों को 'जूनियर रिसर्च फेलोशिप' (JRF) प्रदान की जाती है। जिसके माध्यम से शोधकार्य (PHD) करने वाले छात्रों को प्रतिमाह 30,000/- छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है वहीं परीक्षा उत्तीर्ण करने वालों को महाविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर और प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति का अवसर मिलता है।


हिन्दी विषय में परास्नातक छात्र केंद्रीय विद्यालयों और राज्यों के माध्यमिक विद्यालयों में प्रवक्ता बन सकते हैं। इसके लिए उन्हें प्रतियोगी परीक्षा में सफल होना पड़ता है। जिन छात्रों ने स्नातक के साथ बीएड किया है वे प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (TGT) के लिए आवेदन कर सकते हैं। स्नातक के बाद बीटीसी,जेबीटी अथवा डीएलएड/ बीएलएड करने वाले छात्र प्राथमिक शिक्षा-संस्थानों में भी अध्यापक बन सकते हैं।

अनुवादक/दुभाषिया (Translator and Interpreter)


अनुवाद का क्षेत्र बहुत बड़ा है। दुनिया भर में जैसे-जैसे हिन्दी का प्रयोग बढ़ रहा है वैसे-वैसे अनुवादकों और द्विभाषाविदों की माँग बढ़ती जा रही है। अनेक देशी-विदेशी मीडिया संस्थान, राजनैतिक संस्थाएँ, पर्यटन से जुड़े संस्थान और बड़े-बड़े होटलों में अनुवादकों और दुभाषियों की अच्छी खासी माँग है। युवाओं को चाहिए कि अपने अनुरूप अवसरों को तलाश कर इस क्षेत्र में अपना भविष्य सुरक्षित करें।


रेडियो जॉकी और समाचार वाचक (Radio Jockey and News Reader)


रेडियो जॉकी एक ऐसा कॅरियर है जिसमें आपकी आवाज़ देश-दुनिया में सुनी जाती है। ऑल इण्डिया रेडियो पर प्रस्तोता अमीन सायानी का वो अंदाज़ "जी हाँ भाइयों और बहनों" हम आज तक नहीं भूले है। आज भी रेडियो मिर्ची पर आर जे नवेद हमेशा ट्रेंडिंग में रहता है। बच्चा-बच्चा इस नाम से परिचित है। यह तो मात्र एक उदाहरण है। ऐसी बहुत सी प्रतिभाएँ हैं जो इस क्षेत्र में नाम और दाम कमा रही हैं। यदि आप भी भाषा पर अच्छी पकड़ रखते हैं, आवाज़ अच्छी है और आपमें श्रोताओं का मनोरंजन करने की क्षमता है तो यह एक बेहतरीन करियर है।
इसी से मिलता जुलता काम समाचार वाचक का भी है। इसमें आपको दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए चिंता करने की जरूरत नहीं है। बस आपको अपनी सधी हुई प्रभावशाली आवाज़ में समाचार पढ़ने होते हैं और देश-विदेश की घटनाओं की जानकारी देनी होती है। इनसे संबंधित कोई प्रोफेशनल कोर्स कर लेने से काम मिलने में आसानी हो जाती है।


रचनात्मक लेखन (Creative Writing)


रचनात्मक लेखन के क्षेत्र में जाने वालों के पास दो विकल्प होते हैं। पहला है 'स्वतंत्र लेखन' (Freelancing) और दूसरा फ़िल्म, टीवी, रेडियो आदि संस्थानों में काम करते हुए लेखन। हालाँकि दोनों में कोई विशेष अंतर नहीं है। दोनों ही रूप में आप काम एक ही करते हैं। कुछ लोग किसी संस्था के नियमों और शर्तों में बंधकर काम करना कम पसंद करते है; उनके लिए स्वतंत्र लेखन बेहतर विकल्प होता है। आप शुरुआत किसी संस्था से जुड़कर कर सकते हैं और अनुभव हो जाने के बाद नौकरी छोड़कर फ्रीलांसिंग कर सकते हैं। इस माध्यम से आप घर बैठे काम करते हुए भी पैसे कमा सकते हैं।


ब्लॉग लेखन भी इन्हीं विकल्पों का एक शानदार उदाहरण है। इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के साथ करियर का सुनहरा अवसर है। आपअपनी पसंद का कोई विषय चुनकर इसकी शुरुआत कर सकते हैं और धैर्य के साथ मेहनत करते हुए और साथियों के परस्पर सहयोग से सफलता प्राप्त कर सकते हैं। अच्छीखबर , हैप्पीहिन्दी, साहित्यशिल्पी आदि ऐसे ही कुछ ब्लॉग हैं जिन्होंने हिन्दी ब्लॉगिंग को नया आयाम दिया है।


हिन्दी भाषा  के प्रमुख शिक्षण संस्थान 

(Best institutes of Hindi language, Media and Mass communication)


नीचे हम हिंदी भाषा तथा  मीडिया, जर्नलिज्म आदि के प्रमुख शिक्षण संस्थानों का नाम दे रहे हैं जहाँ से आप अपनी पसंद के क्षेत्र में अध्ययन कर हिंदी में रोजगार के अच्छे अवसर प्राप्त कर सकते हैं।

➢ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय पंचटीला, वर्धा (महाराष्ट्र)

➢ माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, भोपाल (मध्य प्रदेश)

➢ इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन, जे एन यू कैम्पस (नई दिल्ली)

➢ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस (उत्तर प्रदेश )

➢ दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

➢ दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, चेन्नई (तमिलनाडु)

➢ आंध्र विश्वविद्यालय, विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश)

➢ इग्नू (IGNOU), नई दिल्ली


अंत में कह सकते हैं कि विश्वभर में हिंदी भाषा के लगातार बढ़ते प्रयोग और प्रभाव ने हिंदी में रोजगार की संभावनाओं के अनगिनत द्वार खोल दिये हैं और यह भविष्य में और अधिक रोजगारपरक होगी ऐसा निश्चित जान पड़ता है। आप अपनी रुचि, योग्यता और क्षमता के अनुसार अपना क्षेत्र चुनकर अपना भविष्य सँवार सकते हैं।


आपको यह जानकारी कैसी लगी? क्या इस संबंध में आप कोई और जानकारी चाहते हैं? क्या कोई बिंदु जो आपकी जानकारी में है, छूट गया है? कृपया नीचे टिप्पणी (कमेंट) करके अवश्य बताएँ। हम उसे आपके नाम सहित शामिल करेंगे। जानकारी उपयोगी लगे तो मित्रों के साथ साझा (शेयर) भी करें ताकि अधिकाधिक लोग लाभान्वित हो सकें। 


धन्यवाद!

वसंत पंचमी और सरस्वती पूजा Basant panchami aur Saraswati puja

basant ritu and basant (vasant) panchmi
वसंत या बसंत | Basant को ऋतुराज अर्थात् ऋतुओं का राजा (King of all seasons) कहा जाता है। बसंत के मौसम में सूर्यदेव अपनी पूर्ण आभा के साथ प्रकट होने लगते हैं। हाड़कंपाऊ ठंड के बाद तापमान में आनंददायिनी ऊष्मा का संचार होता है। आम के बौरों से अमराइयाँ महक उठती हैं। चारों ओर हरियाली दिखने लगती है। वातावरण में एक नई स्फूर्ति और ताजगी का वास होता है। नव-किसलय और मनमोहक पुष्पों की सुगंध से युक्त वासंती बयार दिग-दिगंत को सुवासित कर देती है। कोयल अपनी मधुर तान छेड़ देती है। मयूर नृत्य करने लगते हैं और ऐसा प्रतीत होता है मानों प्रकृति इस उल्लास में अपना सतरंगी आँचल लहराती हुई उन्मुक्त झूम रही हो।
"वसंत (basant) को कामदेव का पुत्र  (son of Kamdev) माना जाता है और यह मान्यता है कि सौंदर्य के देवता काम के घर बसंत रूपी पुत्र के जन्म का समाचार पाकर प्रकृति आनंदातिरेक से झूम उठती है।"

बसंत ऋतु का समय (Duration of basant ritu) और बसंत पंचमी | Basant panchmi


बसंत ऋतु की शुरुआत बसंत पंचमी (basnat panchami) से होती है। बसंत पंचमी हिन्दी माह के अनुसार माघ महीने की पंचमी तिथि को होती है।


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बसंत ऋतु के साथ ही भारतीय नव-वर्ष का आरंभ होता है। इस तरह भारतीय षड्ऋतु विभाजन के अनुसार वसंत ग्रीष्म ऋतु के पहले और शिशिर ऋतु के बाद आता है। इसे समझने के लिए निम्न सारिणी देखें-

छः ऋतुओं के नाम (6 rituon ke names in Hindi & English)



ऋतुओं के नाम
अंग्रेजी नाम
हिंदी माह
अंग्रेजी महीने
वसंत
Spring
चैत्र-वैशाख
मार्च-अप्रैल
ग्रीष्म
Summer
ज्येष्ठ-आषाढ़
मई-जून
वर्षा
Rains
श्रावण-भाद्रप्रद
जुलाई-अगस्त
शरद
Autumn
आश्विन-कार्तिक
सितंबर-अक्तूबर
हेमंत
Pre-winter
मार्गशीर्ष-पौष
नवम्बर-दिसंबर
शिषिर
Winter
माघ-फाल्गुन
जनवरी-फरवरी

वसंत ऋतु भारतवर्ष में नए वर्ष के आरंभ की ऋतु है। इस कालावधि में प्रकृति में नयापन प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है जो इस बात को सिद्ध करता है कि प्राचीन भारत में अन्य अनेक परम्पराओं की ही तरह ऋतुओं का विभाजन भी वैज्ञानिक और तर्कसंगत रूप से किया गया था।


बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा 

Basant pachmi & Saraswati puja


सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की मानस पुत्री हैं-सरस्वती जिन्हें विद्या की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। सरस्वती संगीत और अन्य समस्त गायन, वादन, ललित, चित्रादि कलाओं की देवी (Goddess of arts) हैं। इनका चतुर्भुज स्वरूप श्वेतवर्णा, श्वेतवसना, श्वेत-पद्मासना, वीणापुस्तक और मालाधारिणी का है। माँ सरस्वती के शारदा, वीणावादिनी, शतरूपा, वाग्देवी, वागेश्वरी आदि अन्य नाम हैं।

वसंत में और उसमें भी वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजन का विशेष महत्व है। विद्यालयों, संगीत-कला संस्थाओं और अन्य शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थाओं में सरस्वती का पूजन विशेष रूप से किया जाता है। बसंत पंचमी के दिन पूजा करने से देवी सरस्वती की कृपा वर्षपर्यंत बनी रहती है और सच्चे हृदय से साधना करने वाले व्यक्ति को सर्वत्र सफलता प्राप्त होती है।

रामचरितमानस के रचयिता तुलसीदास जी ने भी अपने ग्रंथ का आरंभ निम्नलिखित पंक्तियों में सरस्वती वंदना के साथ किया है-
वर्णानामर्थ संघानाम् रसानाम् छंदसामपि ।
मंगलानाम् च कर्तारौ वन्दे वाणी विनायकौ ॥
 विशेष: बच्चों का अक्षरारम्भ और विद्यारम्भ बसंत पंचमी के दिन कराया जाता है। 

"भारत के अतिरिक्त नेपाल, म्यांमार (बर्मा), चीन, जापान, इंडोनेशिया, थाइलैण्ड आदि देशों में भी सरस्वती की पूजा होती है।"

सरस्वती पूजा की विधि 

Saraswati pooja ki vidhi

देवी सरस्वती की पूजा करने के लिए सरस्वती की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित कर स्नानादि के द्वारा पवित्र होकर, पीले अथवा श्वेत वस्त्र धारण करके स्वच्छ और यथासंभव श्वेत आसन पर बैठा जाता है। गंध, अक्षत, केसरिया, पीले या श्वेत पुष्प अर्पित किए जाते हैं। केसरिया या श्वेत चन्दन का टीका किया जाता है और पीले चावल, खीर, मेवा, मिष्ठान्न आदि का भोग लगाया जाता है। इस तरह यथौपलब्ध सामग्री के द्वारा भक्तिभाव से प्रार्थना करते हुए माँ की पूजा की जाती है और सरस्वती मंत्र का पाठ किया जाता है।


  सरस्वती वंदना 

(Saraswati Vandna)


या कुन्देन्दु तुषार हार धवला या शुभ्र वस्त्रावृता।
या वीणा वरदण्डमण्डितकरा या श्वेत पद्मासना॥
या ब्रह्माच्युतशंकर: प्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता।
सा माम् पातुसरस्वतीभगवती निःशेषजाड्यापहा॥

शुक्लां ब्रह्म विचार सार परमाद्याम् जगद्व्यापिनीम्।
वीणापुस्तकधारिणीमभयदाम् जाड्यान्धकारापहम्॥
हस्तेस्फटिकमालिकाम् विदधतीम् पद्मासने संस्थिताम्।
वन्दे तां परमेश्वरीम् भगवतीम् बुद्धिप्रदाम् शारदाम्॥ 


सरस्वती मंत्र 

(Saraswati Mantra)


शारदा शारदाम्भोज वदना वदनाम्बुजे।
सर्वदासर्वदास्माकम् सन्निधिम्सन्निधिम् क्रियात्॥

विद्याध्ययन से पूर्व निम्नलिखित मंत्र का पाठ करने से माँ सरस्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है-

सरस्वती नमस्तुभ्यम् वरदे कामरूपिणी।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा॥



!!जय माँ सरस्वती!! 

सुमधुर भावों की सुंदर प्रेम कविता love poem - लौट आओ

प्रियतम ने वादा किया था लेकिन वक्त पर भूल गया। ऐसा अक्सर हो जाता है। ऐसे में प्रेमिका का रूठना स्वाभाविक है। वह रूठ कर चली जाती है। फिर शुरू होता है मान-मनुहार का सिलसिला। प्रेमिका (पत्नी) को मनाने और उसे लौट आने की मिन्नतें करते-करते प्रियतम (पति) ने क्या-क्या कह दिया, क्या-क्या याद दिला दिया और कौन-कौन सी कसमें दे दीं! आनंद लें इन सुमधुर भावों का इस छोटी सी प्रेम कविता (love poem) में।

love poem in hindi

कवि सोम ठाकुर की प्रेम कविता | Love Poem - लौट आओ


लौट आओ, माँग के सिंदूर की सौगंध तुमको,

नयन का सावन निमंत्रण दे रहा है।

लौट आओ, आज पहले प्यार की सौगंध तुमको,

प्रीत का बचपन निमंत्रण दे रहा है।

लौट आओ मानिनी, है मान की सौगंध तुमको,

बात का निर्धन निमंत्रण दे रहा है।

लौट आओ, हारती मनुहार की सौगंध तुमको,

भीगता सावन निमंत्रण दे रहा है।





रामचरितमानस (तुलसी रामायण) के सात कांड || 7 Kand of Ramcharitmans (Tulsidas_Ramayan)

अवधी भाषा में रामायण (रामचरितमानस) की रचना करते हुए संत तुलसीदास जी

रामचरितमानस (रामायण) : हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर 

श्री रामचरितमानस (तुलसीकृत रामायण) हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। इस महाकाव्य की रचना संत तुलसीदास द्वारा १६वीं शताब्दी में 'अवधी भाषा' में की गई थी। हिंदी भाषियों के बीच यह रामायण के रूप में ही प्रसिद्ध है। कहते हैं तुलसीदास जी महर्षि वाल्मीकि ही थे जिन्होंने कलयुग में तुलसीदास के रूप में जन्म लेकर रामायण को जनकल्याणकारी और सर्वसुलभ रूप में सामान्य जनमानस के समक्ष उद्घाटित किया और उसे नाम दिया- 'रामचरितमानस'।

रामचरितमानस की हर चौपाई में सीता-राम हैं क्योंकि इसकी हर चौपाई में स, त, र, म अवश्य मिलेगा। इसी कारण इसकी एक-एक चौपाई को मंत्र की तरह प्रयोग किया जाता है।

रामचरित मानस का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का आदर्श और अनुकरणीय जीवन चरित चित्रित करने वाले इस महाग्रंथ को "हिन्दू जनमानस की आदर्श आचार संहिता" कहना अनुचित न होगा। रामचरितमानस विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय पचास (५०) काव्य ग्रंथों में से एक है।

माना जाता है कि तुलसीदास जी ने लोककल्याण के लिए लोक-प्रचलित भाषा में रामायण की  रचना भगवान शंकर के आदेश से की।

रामचरितमानस में राम को त्रेता युग में अवतरित भगवान विष्णु के अवतार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वाल्मीकीय रामायण और तुलसीकृत रामायण में यही प्रमुख अंतर है। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में राम को एक असाधारण किन्तु लौकिक पुरुष के रूप में दर्शाया है जबकि तुलसीदास ने राम को अवतारी रूप में चित्रित किया है। फिर भी उनका मर्यादा पुरूषोत्तम स्वरूप जनसाधारण के लिए सहज अनुकरणीय है।


रामचरितमानस एक महाकाव्य है जो दोहा-चौपाई शैली में लिखा गया है। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य छंद जैसे सोरठा, सवैया आदि का भी प्रयोग किया गया है। प्रायः चार चौपाइयों के बाद एक दोहा आता है लेकिन यह कहीं-कहीं कम-ज्यादा भी है। वैसे मेरा अनुभव है कि इस मामले में अयोध्याकाण्ड सबसे सटीक है। इस काण्ड में चौपाइयों और दोहे के बीच का अंतर प्रायः समान है।


पूरा रामचरितमानस सात (७) काण्ड (अध्याय) में विभक्त है।दूसरे शब्दों में कहें तो रामचरितमानस में कुल सात अध्याय हैं जिन्हें काण्ड कहा गया है। प्रत्येक काण्ड का नाम उसमें वर्णित प्रमुख घटना/कालखण्ड/स्थानादि के आधार पर रखा गया है। जैसे श्रीराम के बाल्यकाल का वर्णन होने के बालकाण्ड।

श्री रामचरितमानस के सात कांड या सात सोपान (अध्याय)

रामचरितमानस में कुल सात कांड हैं। प्रत्येक कांड का आरंभ संस्कृत के श्लोकों से हुआ है। उसके बाद दोहा या सोरठा और फिर चौपाई। सामान्यतः चार चौपाई के बाद एक दोहा आता है। बीच-बीच में अन्य छंद भी अवसरानुकूल आते रहते हैं। इसी प्रबन्ध में सम्पूर्ण रामचरितमानस रचित है। रामचरितमानस के विस्तार (आकार) का अनुमान उसके दोहों की संख्या से किया जाता है। हम आगे प्रत्येक कांड के साथ उसमें आए दोहों की संख्या भी लिख रहे हैं जो आपके लिए अधिक उपयोगी होगा।

रामचरितमानस के सातों कांड का अति संक्षिप्त उल्लेख आगे किया गया है-

बालकाण्ड - रामचरितमानस का आरंभ बालकांड से होता है। इस कांड में श्री राम के जन्म और बाल्यकाल की कथा वर्णित है। शंकर-पार्वती का विवाह भी इसकी अन्य प्रमुख घटना है। इसमें कुल ३६१ दोहे हैं। यह रामचरितमानस का सबसे बड़ा काण्ड है।

अयोध्याकाण्ड - अयोध्या की कथा का वर्णन अयोध्याकाण्ड के अंतर्गत हुआ है। राम का राज्याभिषेक, कैकेयी का कोपभवन जाना और वरदान के रूप में राजा दशरथ से भरत के लिए राजगद्दी और राम को वनवास माँगना और दशरथ के प्राण छूटना आदि घटनाएँ प्रमुख हैं। इस कांड में ३२६ दोहे हैं।

अरण्यकाण्ड - राम का सीता लक्ष्मण सहित वन-गमन मारीचि-वध और सीता-हरण की कथा का वर्णन अरण्यकांड में हुआ है। इसमें ४६ दोहे हैं।

किष्किंधाकाण्ड - राम का सीता को खोजते हुए किष्किंधा पर्वत पर आना, श्री हनुमानजी का मिलना, सुग्रीव से मित्रता और बालि का वध इत्यादि घटनाएँ किष्किंधा काण्ड में वर्णित हैं। इसमें ३० दोहे हैं।

किष्किंधाकांड रामचरितमानस का सबसे छोटा काण्ड है।

सुन्दरकाण्ड - सुंदरकांड का रामायण में विशेष महत्व है। इस कांड में सीता की खोज में हनुमानजी का समुद्र लाँघ कर  लंका को जाना, सीताजी से मिलना और लंकादहन की कथा का वर्णन है। अशोक वाटिका सुंदर पर्वत के परिक्षेत्र में थी जहाँ हनुमानजी की सीताजी से भेंट होती है। इसलिए इस काण्ड का नाम सुन्दरकाण्ड है। इसके पाठ का विशेष पुण्य है और इससे हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसमें कुल ६० दोहे हैं।

लंकाकाण्ड - सेतुबंध करते हुए राम का अपनी वानरी सेना के साथ लंका को प्रस्थान, रावण-वध और फिर सीता को लेकर लौटना यह सब कथा लंकाकाण्ड के अंतर्गत आती है। इसमें कुल १२१ दोहे हैं।

वाल्मीकीय रामायण में लंकाकांड का नाम युद्धकांड है।

उत्तरकाण्ड - जीवनोपयोगी प्रश्नों के उत्तर इस उत्तरकाण्ड में मिलते हैं। इसका काकभुशुण्डि-गरुड़ संवाद विशेष है। इस कांड में १३० दोहे हैं। इसमें श्रीराम का चौदह वर्ष के वनवास के उपरांत परिवार वालों और अवधवासियों से पुनः मिलने का प्रसंग बहुत मार्मिक है। इसी कांड के साथ ही रामचरितमानस का समापन हो जाता है।


बंधुओं! रामचरितमानस का धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से जितना महत्व है; जीवन शैली, सामाजिक समरसता और साहित्य की दृष्टि से भी उससे कम नहीं है। अवधी भाषा में रचित यह कालजयी ग्रंथ हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर है जो हमें पीढ़ियों से लाभान्वित करता आ रहा है और समय के साथ और भी प्रासंगिक होता जा रहा है।

आपको कुछ नई जानकारी मिली हो तो अन्य को भी बताएँ।

!!जय श्री राम!!








मिर्ज़ा ग़ालिब के १५ बेहतरीन शेर || 15 Best Sher-Shayri of Mirza Ghalib

"ग़ालिब तेरे क़लाम में क्योंकर मज़ा न हो,
पीता हूँ रोज़ धोकर शीरीं सुखन के पाँव।"
मिर्ज़ा ग़ालिब के जैसा शायर अब शायद दुबारा नहीं होगा। उनकी शख्शियत, ज़िन्दगी के हर पहलू पर उनका नज़रिया, उनका अंदाजे बयाँ, उनकी कलम और उनका क़लाम उन्हें बेजोड़ बनाता है। यूँ तो ग़ालिब साहब मूलतः फ़ारसी के शायर हैं फिर भी उन्होंने उर्दू में जितना लिखा है, उर्दू अदब के बाक़ी सारे क़लमकारों को मिला देने से भी उसकी बराबरी न हो सकेगी।

उनकी प्रसिद्धि का आलम यह है कि बड़े-बुज़ुर्ग तो छोडिए नए लड़के भी अक्सर बोलते रहते हैं - "हमारी शख्शियत का अंदाज़ा तुम क्या लगाओगे 'गालिब'.. । आप ज़िन्दगी के किसी भी मोड़ पे हों मिर्जा ग़ालिब की शायरी आपके साथ खड़ी मिलेगी। मोहब्बत, बेवफाई, रुसवाई पर तो उन्होंने खूब लिखा ही है, ज़िन्दगी से लेकर जन्नत तक के बाक़ी मौज़ूआत पर भी उन्होंने भरपूर लिखा है और बहुत ख़ूब लिखा है।

आज इस बेहद मशहूर, हर दिल अजीज़ शायर जनाब मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्मदिन है। आइए इस मौक़े पर पढ़ते हैं उनके कुछ चुनिन्दा, बेहतरीन शेर जो मुझे बहुत पसंद हैं और मैं उम्मीद करता हूँ कि आपको भी पसंद आयेंगे। वैसे मैंने कोशिश की है कि ग़लतियाँ कम से कम हों लेकिन चूँकि मुझे उर्दू की कोई ख़ास जानकारी नहीं है इसलिए गलतियों के लिए माफ़ी चाहूँगा और यह भी गुज़ारिश करूँगा कि जहाँ ग़लतियाँ हैं उन्हें आप सही करेंगे।

पेश-ए-ख़िदमत है-


१.
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना।
आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्साँ होना।।



२.
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का,
उसी को देखकर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले।



३.
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना।
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।।



४.
तोड़ा कुछ इस अदा से ताल्लुक उसने ग़ालिब,
कि हम सारी उम्र अपना क़ुसूर ढूँढ़ते रहे।



५.
हमने माना कि तग़ाफुल न करोगे लेकिन,
खाक हो जायेंगे हम तुझको ख़बर होने तक।



६.
इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे काम के।



७.
आईना क्यों न दूँ कि तमाशा कहें जिसे।
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे।।



८.
उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक,
वो समझते हैं बीमार का हाल अच्छा है।



९.
बेवजह नहीं रोता कोई इश्क़ में ग़ालिब
जिसे ख़ुद से बढकर चाहो वो रुलाता ज़रूर है।



१०.
ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता।
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।।



११.
ग़ालिब शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर,
या वो जगह बता जहाँ पर ख़ुदा न हो।



१२.
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,
दिल के बहलाने को ग़ालिब ख़याल अच्छा है।



१३.
दर्द देकर सवाल करते हो।
तुम भी ग़ालिब कमाल करते हो।।
देखकर पूछ लिया हाल मेरा।
चलो कुछ तो ख़याल करते हो।।



१४.
फिर उसी बेवफा पे मरते हैं,
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है।।
बेख़ुदी बेसबब नहीं ग़ालिब,
कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है।।



१५.
हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले।
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।।
---------------------------------------------------------
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन।
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।।




परिचय-रामधारी सिंह 'दिनकर':: सलिल कण हूँ कि पारावार हूँ मैं?

बँधी है लेखनी लाचार हूँ मैं



सलिल कण हूँ, कि पारावार हूँ मैं?
स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं?
बँधा हूँ, स्वप्न हूँ, लघु वृत हूँ मैं,
नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं।


समाना चाहता, जो बीन उर में,
विकल उस शून्य की झंकार हूँ मैं।
भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में,
सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं।

जिसे निशि खोजती तारे जलाकर,
उसी का कर रहा अभिसार हूँ मैं।
जनम कर मर चुका सौ बार लेकिन,
अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं।

कली की पंखुडीं पर ओस-कण में,
रंगीले स्वप्न का संसार हूँ मैं।
मुझे क्या आज ही या कल झरुँ मैं,
सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं।

मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण! जब से,
लगा ढोने व्यथा का भार हूँ मैं।
रुदन अनमोल धन कवि का,
इसी से ही पिरोता आँसुओं का हार हूँ मैं।

मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का,
चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं।
पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी,
समा जिसमें चुका सौ बार हूँ मैं।

न देखे विश्व, पर मुझको घृणा से,
मनुज हूँ, सृष्टि का शृंगार हूँ मैं।
पुजारिन, धूलि से मुझको उठा ले,
तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं।

सुनूँ क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा,
स्वयं युग-धर्म की हुंकार हूँ मैं।
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का,
प्रलय-गांडीव की टंकार हूँ मैं।

दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा का,
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं।
सजग संसार, तू निज को सम्हाले,
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं।

बँधा तूफान हूँ, चलना मना है,
बँधी उद्याम निर्झर-धार हूँ मैं।
कहूँ क्या, कौन हूँ, क्या आग मेरी,
बँधी है लेखनी, लाचार हूँ मैं।

~रामधारी सिंह 'दिनकर'

हिंदी अंक (देवनागरी) || Hindi digits/numbers

"अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बौ : अस्सी नब्बे पूरे सौ"

हिंदी के मानकीकरण के अनेक अदूरदर्शी प्रयासों ने आज हिंदी के अंको की स्थिति यह कर दी है कि सामान्य शिक्षार्थी तो क्या हिंदी के शिक्षक भी हिंदी (देवनागरी) में लिखी संख्याओं को पढ़ने में अचकचा जाते हैं। एकरूपता के चक्कर में या थोड़े से आलस्य के कारण अथवा कदाचित किसी कुचक्र में फँसकर हम अपनी जड़ों से कैसे कटते जा रहे हैं शायद हमें कभी इस पर विचार करने की फुरसत नहीं मिली? आज से २० साल बाद जब हमारे बच्चे किसी पुरानी पुस्तक में लिखी हिंदी की गिनतियाँ समझ पाने में असमर्थ होंगे तो आखिर हम किसको दोष देंगे? रोमन अंकों को अंतर्राष्ट्रीय अंक कहकर क्या हमने यह मान लिया है कि हिंदी के अंक अन्तराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित हो पाने की योग्यता ही नहीं रखते? और इसलिए क्या हम देवनागरी के अंकों को तिलांजलि दे दें? ज़रा इन प्रश्नों पर विचार करें।

हमारे नीति-नियंताओं ने आजादी के बाद से अब तक हिंदी को दयनीय दशा में पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय देश के जनजन की आवाज बनकर गूँजने वाली हिंदी आज सत्तर साल बीत जाने के बाद भी संवैधानिक रूप से राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं प्राप्त पायी है। हिंदी को उसका वास्तविक स्थान दिलाने के होने वाले सारे प्रयासों को बड़े ही नियोजित तरीके से विफल किया जाता रहा है। हिंदी को सरल बनाने के नाम पर (जबकि यह पहले से बहुत ही सरल और स्पष्ट भाषा है) तथाकथित भाषाविदों ने इसकी कमर तोड़ दी है। कोई कहता है कि कम्प्यूटर में तो अमुक चिह्न ऐसे बनता है इसलिए हमें हिंदी की अमुक वर्तनी में परिवर्तन करना ज़रूरी है। कोई सुझाव देता है कि हिंदी में अमुक विराम चिह्न लगाने में  समय ज्यादा लगता है इसलिए हमें अंग्रेजी वाला फुल स्टॉप हिंदी में भी प्रयोग कर लेना चाहिए। कोई कहता है कि अमुक शब्द का उच्चारण करने में समस्या हो रही है इसलिए इसको ऐसे नहीं ऐसे बोला जाय। अरे भई! अंग्रेजी बोलते-बोलते आपके मुखावयव कमजोर पड़ गए हैं, आपका मुँह पूरा खुलता ही नहीं तो आप उसका इलाज कीजिए, थोड़ी कसरत कीजिये, योग-प्राणायाम आदि का सहारा लीजिये; दूसरों को क्यों भ्रमित करते हैं।

अजीब स्थिति हो गयी है। बच्चा 'भर' को 'मर' लिख रहा है तो उसे सही अक्षर सिखाने की बजाय हम 'मर' को ही 'भर' मान लें और उसे यही लिखने दें? कितनी हास्यास्पद बात है! अगर दो-चार अक्षरों या चिह्नों को लिखने में दिक्कत हो रही है तो क्या हम उसके लिए हम देवनागरी के स्वरुप को ही विकृत कर देंगे? क्या हम उन विसंगतियों को दूर करने का प्रयास नहीं कर सकते? आज जबकि दुनियाभर में भारत के सॉफ्टवेर इंजीनियरों की तूती बोल रही है क्या हम दो-चार उत्साही लड़कों को लगाकर इसके लिए सॉफ्टवेयर नहीं तैयार करवा सकते? करने को तो हम सब कर सकते हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि हम करना ही नहीं चाहते। तमाम हिंदी प्रेमियों ने अपने स्तर से हिंदी के लिए बहुत से काम किये हैं जिससे कम्प्यूटर पर हिंदी में काम करना बहुत आसान हो गया है। प्रयोक्ताओं की तेजी से बढ़ती संख्या के कारण गूगल और माइक्रोसोफ्ट जैसी बड़ी कंपनियों ने भी अपने व्यापार को दृष्टिगत रखते हुए कम्प्यूटर और इंटरनेट में काफी कुछ हिंदी में उपलब्ध करवा दिया है। यूनिकोड फॉण्ट से लेकर शब्द संसाधक और ऑपरेटिंग सिस्टम तक सब कुछ हिंदी में उपलब्ध है। फ़ोन में एण्ड्रोइड ऑपरेटिंग सिस्टम के आ जाने से और भी सुविधा हो गयी है।


हिंदी के अंकों की बात करें तो उसके प्रयोग में तो कहीं कोई समस्या है ही नहीं। हम इन्हें मनचाहे रूप में कम्प्यूटर में टाइप भी कर सकते हैं और साधारण हिंदी जानने वाला कोई भी व्यक्ति इन अंकों को सम्प्रति समझ भी सकता है। लेकिन यही स्थिति रही तो आने वाले समय में ये सरस्वती नदी की भाँति विलुप्त हो जायँ तो यह कोई आश्चर्य की बात न होगी। अच्छा, कुछ लोग तो अनायास ही अंग्रेजी घुसेड़ने के मौके तलाशते रहते हैं। मेरा अपना अनुभव है जब मैं किसी सज्जन को अपना नंबर बताता हूँ तो मजाल क्या कि बिना अंग्रेजी का प्रयोग किये भला मानुष समझ पाये!  मैं उनतालीस बोलूँगा तो सामने वाले सज्जन के मुँह से तुरंत निकलेगा - "थर्टी नाइन ना ?" बच्चों की दशा का क्या कहें! पहली कक्षा के किसी बच्चे से टू प्लस टू पूछिए तुरंत उत्तर देगा-"फ़ोर", और आप यह पूछ लीजिए कि दो धन दो कितना होगा तो बेचारा मुँह ताकने लगेगा। क्या हम उस बच्चे के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं या फिर हिंदी के? समय मिले तो कृपया विचार कीजिएगा।

बंधुओं आप सब से अनुरोध है कि कोई कुछ करे न करे आप अपने स्तर से यथासंभव प्रयास अवश्य करें।अपने बच्चों को बेशक अंग्रेजी सिखायें किंतु हिंदी के अंकों का ज्ञान भी उसे अवश्य दें और स्वयं भी हिंदी के अंकों का प्रयोग करें।

नीचे की सारिणी में कम्प्यूटर से ही टाइप किये गये देवनागरी-अंक दिए गए हैं-
हिंदी अंक-देवनागरी लिपि
शब्दों में
अंग्रेजी अंक-रोमन लिपि
(तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय अंक)
शून्य
0
एक
1
दो
2
तीन
3
चार
4
पाँच
5
छह
6
सात
7
आठ
8
नौ
9

"अपने बच्चे को कुछ भी बनाएँ लेकिन उसे हिंदी अवश्य पढ़ाएँ"