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प्रेम और कुछ कविताएँ-रोहित ठाकुर

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__ प्रेम __ उन दोनों के बीच प्रेम था  पर वह प्रत्यक्ष नहीं था उन दोनों ने एक दूसरे को कई साल फूल भेजे  एक-दूसरे के लिये कई नाम रचे  वे शहर बदलते रहे और एक दूसरे को याद करते रहे वे कई-कई बार अनायास चलते हुए पीछे मुड़कर देखते थे उन्होंने कई बार गलियों में झाँक कर देखा होगा फिर कई सदियाँ बीतीं  वे दोनों पर्वत बने पिछली सदी में वे बारिश बने  इतना मुझे यकीन है  इस सदी में वे ओस बने फिर किसी सफेद फूल पर गिरते रहे॥ __ बारिश  ___ बारिश के दिनों में  पानी की बूँद के छिलके फूलों पर गिरते हैं  कोई गिलहरी का गिरोह दौड़ कर पास आता है  और मायूस हो जाता है  पानी की बूँद के छिलके अखरोट के छिलके नहीं होते एक आदमी इस उम्मीद में है कि दुःख का छिलका  उतरने के बाद सुख आता है॥ ___ एक दिन  __ एक दिन जब तुम्हारी आँखों का पानी सूख जाये पास कोई नदी न हो तुम अपने अंदर की नमी को छूना आ सको तो चले आना, मेरे सीलन भरे कमरे में वहाँ बरसों से बादल का एक टुकड़ा खूँटी पर टँगा है किसी एक द...