प्रेम और कुछ कविताएँ-रोहित ठाकुर

रोहित ठाकुर, पटना, बिहार | भारतीहिंदी ब्लॉग| bhartihindi.blogspot.com

__ प्रेम __


उन दोनों के बीच प्रेम था 
पर वह प्रत्यक्ष नहीं था
उन दोनों ने एक दूसरे को कई साल फूल भेजे 
एक-दूसरे के लिये कई नाम रचे 
वे शहर बदलते रहे और एक दूसरे को याद करते रहे
वे कई-कई बार अनायास चलते हुए पीछे मुड़कर देखते थे
उन्होंने कई बार गलियों में झाँक कर देखा होगा
फिर कई सदियाँ बीतीं 
वे दोनों पर्वत बने
पिछली सदी में वे बारिश बने 
इतना मुझे यकीन है 
इस सदी में वे ओस बने
फिर किसी सफेद फूल पर गिरते रहे॥


__ बारिश  ___


बारिश के दिनों में 
पानी की बूँद के छिलके फूलों पर गिरते हैं 
कोई गिलहरी का गिरोह दौड़ कर पास आता है 
और मायूस हो जाता है 
पानी की बूँद के छिलके अखरोट के छिलके नहीं होते
एक आदमी इस उम्मीद में है कि दुःख का छिलका 
उतरने के बाद सुख आता है॥


___ एक दिन  __


एक दिन जब तुम्हारी आँखों का पानी सूख जाये
पास कोई नदी न हो
तुम अपने अंदर की नमी को छूना
आ सको तो चले आना, मेरे सीलन भरे कमरे में
वहाँ बरसों से बादल का एक टुकड़ा खूँटी पर टँगा है
किसी एक दिन मैंने अपने हाथ से दीवार पर लिखा था 'बारिश'
उस दिन से मेरी उँगलियों से झड़ रही है मेह॥


रोहित ठाकुर  पटना, बिहार।



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