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25 जुलाई 2014

हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान || Hindi Hindu Hindustan

    हिन्दी हिंदुस्तान की सर्वप्रमुख भाषा है, किंतु यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि 'हिंदी' शब्द की व्युत्पत्ति में भारतीय नहीं अपितु वैदेशिक कारक उत्तरदायी हैं। 

'सिन्धु' शब्द का भारतवर्ष से गहरा सम्बन्ध है। भारत की पहचान में सिन्धु का भी अपना स्थान रहा है। जब ईरान के लोग भारत आए तो उन्होंने सिन्धु को हिन्दु कहना आरंभ कर दिया क्योंकि फ़ारसी में 'स' वर्ण का उच्चारण 'ह' के रूप में किया जाता है।

इस प्रकार सिन्धु परिवर्तित होकर हिंदु और सिन्धु प्रदेश के निवासी हिंदु या हिन्दू हो गए। हिन्दू का अर्थ हुआ हिन्द का रहने वाला और हिन्दी का मतलब हिन्द का। स्पष्टतः इनकी भाषा भी हिन्दवी या हिंदी बोली जाने लगी। समय के साथ आर्यावर्त और भारतवर्ष के साथ हिंदुस्तान शब्द का भी प्रयोग होने लगा। "हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान" के मूल में यही तथ्य विद्यमान है।


     हिंदी भाषा का जन्म कब हुआ इस संबंध में यद्यपि कोई एक तिथि निर्धारित कर पाना मुश्किल है तथापि यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि हिंदी भाषा का प्रयोग सातवीं शताब्दी के आसपास ही आरंभ हो गया था।

    माना जाता है कि हिंदी का सर्वप्रथम प्रयोग अमीर खुसरो ने किया। उन्होंने गयासुद्दीन तुगलक के बेटे को भाषा (हिंदी) सिखाने के लिए 'ख़ालिकबारी' नामक ग्रंथ की रचना की जिसमें 'हिन्दवी' शब्द 30 बार और 'हिंदी' शब्द 5 बार आया है। चूँकि खुसरो का समय तेरहवीं सदी माना जाता है इसलिए 'हिंदी' शब्द का पहला प्रयोग भी तेरहवीं सदी में हुआ। परंतु 'हिंदी' शब्द का प्रयोग होने से पहले ही उस भाषा का प्रयोग आरंभ हो चुका था जिसमें आधुनिक हिंदी के लक्षण विद्यमान थे।

'सरहपा' या 'सरहपाद' को हिंदी का पहला कवि माना जाता है जिनका समय सातवीं शताब्दी है। कतिपय विद्वान 'पुष्य' या 'पुण्ड' नामक कवि को हिंदी का पहला कवि मानते हैं। इनका भी समय सातवीं शताब्दी का है। अतः निर्विवाद रूपेण हिंदी भाषा का प्रादुर्भाव सातवीं शताब्दी जानना चाहिए।

     हिंदी भाषा 7वीं सदी से आरंभ होकर आज 21वीं सदी में उत्तरोत्तर प्रगति को प्राप्त होती हुई विश्व में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा के रूप में प्रतिष्ठित है।दुनिया के सैकड़ों देशों में हिंदी का प्रयोग हो रहा है। इसकी 'देवनागरी' लिपि को विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसमें भारतेंदु हरिश्चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मुंशी प्रेमचंद, महात्मा गाँधी, डॉ० हरिवंशराय बच्चन और अनेकानेक युग पुरोधाओं ने अपना अमूल्य योगदान दिया है।

भारत आज विश्व मंच पर दमदारी के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहा है। ऐसे में हिंदी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यह हमारा पुनीत कर्तव्य है कि हिंदी का यथासंभव अधिकाधिक प्रयोग करें, इसका सम्मान करें और इसे सच्चे अर्थों में 'राष्ट्रभाषा' बनाने में अपना सहयोग प्रदान करें।

अंततः राष्ट्र के विकास में मातृभाषा के उत्थान के महत्व को रेखांकित करतीं निम्न पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-

निज भाषा उन्नति अहै,सब उन्नति कौ मूल।
बिन निज भाषा  ज्ञान के,मिटै न हिय को शूल।।
     

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