वर्तमान समाज में कुछ तथाकथित संत और धर्माचार्य ऐसे भी हैं जो अपना 'कल्याण' करने में तो सफल हैं किन्तु उनके आडंबरपूर्ण आचरण और कपोल कल्पित धर्मोपदेशों से समाज को बहुत बड़ी हानि हो रही है। साथ ही इन छद्मवेषधारी संतों के कारण धर्म और धार्मिकता को भी बहुत बड़ी हानि हो रही है। इनके कारण आज समाज के सभी साधु-संत और उपदेशक संदेह की दृष्टि से देखे जा रहे हैं। जो हमारे समाज लिए किसी भी प्रकार से अच्छा नहीं है। 

आज समाज में व्याप्त धार्मिक विकृतियों और विद्रूपताओं के लिए ये तथाकथित धर्मोद्धारक कम उत्तरदायी नहीं हैं। इस समय चतुर्दिक धर्म का विकृत रूप दृष्टिगोचर होता है। धार्मिक कट्टरता, दुराग्रह, और अन्य धर्मों के प्रति विद्वेष की भावना परिलक्षित हो रही है। छोटी-छोटी बातों पर लोग आक्रोशित हो जाते हैं और धर्म के मूल स्वरूप और और उद्देश्य को भूलकर आचरण करने लगते हैं। यह सब इन्हीं पथभ्रष्टकों का प्रभाव है। ये धर्म के ठेकेदार धर्म के नाम पर समाज को जोड़ने का नहीं अपितु तोड़ने का काम कर रहे हैं, जिसके लिए हमें जागरूक होने की आवश्यकता है।

ध्यान रहे ऐसे तथाकथित धर्मगुरु केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं हैं बल्कि सभी धर्मों में हैं।

वास्तव में ये समाज में अकर्मण्यता को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं। ऐसे छद्मवेषधारी संतों के धर्मोपदेशों से किसका कितना कल्याण हो रहा है यह तो कह पाना मुश्किल है, किन्तु प्रवचन सभाओं में उमड़ने वाली भारी भीड़ यह आभास अवश्य कराती है कि देश की जनशक्ति का कितना अपव्यय हो रहा है! भोले-भाले लोग इनके मकड़जाल में फँस कर अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाते हैं। यहाँ तक कि वशीकृत होकर अपने और अपनों तक को छोड़ देते हैं और गलत राह पर चल पड़ते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि कोई सद्गुरु किसी गृहस्थ को घर-बार छोड़ने के कभी नहीं कह सकता है न किसी की भावनायें भड़काने का कार्य करता है और न ही किसी उद्देश्य के लिए हिंसा और  हथियार उठाने के लिए ही कह सकता है। ऐसा व्यक्ति निश्चित रूप से ढोंगी है, बहुरूपिया है, द्रोही है और किसी निहित स्वार्थ के कारण ऐसा कर रहा है।

आवश्यकता इस बात की है कि हम ऐसे लोगों को पहचानें। आँख मूँदकर किसी पर भी विश्वास कर लेने की बजाय थोड़ा विचार करें। सोचें कि जो स्वयं को ही ईश्वर बताता हो क्या वह संत हो सकता है? जो सांसारिक सुखों और भोग-विलास में लिप्त हो और धन संचय के लिए भाँति-भाँति के अनुचित कृत्य में संलग्न हो क्या ऐसा प्रवंचक हमें सन्मार्ग दिखा सकता है? क्या वास्तव में ऐसा धूर्त व्यक्ति हमारा  कल्याण कर सकता है? 

विचार करें फिर विश्वास करें।

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