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02 दिसंबर 2014

डॉ. राजेश कुमार मिश्र का आलेख - भाषा शिक्षण : चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ



र्तमान समय में तेजी से प्रगति कर रहे शैक्षिक परिवेश में भाषा शिक्षण का क्षेत्र भी अत्यंत चुनौतियों से भर चुका है। आज के शैक्षिक वातावरण में अध्ययनरत विद्यार्थियों को परम्परागत तरीके की शिक्षण प्रणाली न केवल उनको नीरसता की ओर ले जाती है बल्कि निष्क्रियता की ओर भी ढकेल देती है। आज का विद्यार्थी २१वीं सदी का शिक्षार्थी है जो शैक्षिक विषयों को भी अपने लक्ष्य प्राप्त करने का साधन मानकर चलता है। अगर उसे लगता है कि कोई विषय उसके लक्ष्य साधन के लिए आवश्यक अंग नहीं है तो वह उसकी ओर या तो बहुत ही कम ध्यानाकृष्ट करता है या फिर अनिवार्य होने की दशा में अत्यंत नीरस भाव से एक सीमा तक उसका भार सहन करने की कोशिश में लग जाता है। ऐसी परिस्थितियों में इन विद्यार्थियों को परम्परागत शिक्षण पद्धति द्वारा शिक्षित करने का उद्देश्य शिक्षक के लिए अत्यंत कठिन एवं दुरूह हो जाता है।

आज का युग तकनीकी का युग है। इस युग के क्रियाशील अंग होने के नाते आज भाषायी शिक्षकों का भी यह दायित्व बन जाता है कि आज की युवा पीढ़ी की आवश्यकता और रुचि को ध्यान में रखते हुए वे अपनी शिक्षण प्रणाली में समयानुसार परिवर्तन करें जिससे आज की इस पीढ़ी को अपनी ओर आकर्षित कर उन्हें न केवल भाषायी आधार प्रदान करें बल्कि एक सुयोग्य नागरिक बनाने के लिए उनमें नैतिकता का भी बीजारोपण करें। भाषा के पाठ्यक्रम में नैतिक मूल्य परक कहानियों, कविताओं या प्रसंगों का आवश्यकता के अनुसार जोड़ना सदैव लाभदायक तथा विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों के जागरण हेतु अत्यंत उपयोगी हो सकता है। भाषा को रुचिकर बनाने हेतु यदि तकनीकी का उचित प्रयोग किया जाए तो वह विषयवस्तु विद्यार्थियों के लिए आकर्षक तथा सहज ग्रहणीय हो जाती है। पाठ्य-सहगामी क्रियाएँ भी विद्यार्थियों में भाषा के प्रति आत्मीयता का भाव पैदा करने में सहायक सिद्ध होती हैं।
भाषा को सीखना या उसको आत्मसात करने के लिए प्रबल इच्छा शक्ति का होना भी बहुत ही आवश्यक है और यह इच्छा शक्ति तब तक प्रकट नहीं होती जब तक विद्यार्थी या किसी भी सामान्य व्यक्ति को उसे ग्रहण करने के उपरान्त उससे कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ दिखाई नहीं देता। इसका अर्थ यह हुआ कि जब तक विद्यार्थियों को भाषा के सीखने से भविष्य में होने वाले लाभों या जीवन में उसकी उपयोगिता के बारे में समुचित ज्ञान नहीं होगा तो तब तक इस ज्ञानार्जन में उसकी रुचि जाग्रत नहीं हो सकती। इस परिस्थिति में एक शिक्षक होने के साथ-साथ एक मार्गदर्शक की भूमिका भी हम शिक्षकों को ही निभानी पड़ेगी। यदि आप अपने विद्यार्थियों को अपनी भाषा के जीवनोपयोगी सत्यों तथा आगामी जीवन में उसकी उपयोगिता से बच्चों को प्रभावित कर सके तो समझ लीजिए कि लक्ष्य की आधी दूरी आपने तय कर ली है। आज के विद्यार्थियों को यह समझाना बहुत ही ज़रूरी है कि उनके भविष्य को स्वर्णिम बनाने के लिए इस भाषा का ज्ञान बहुत ही आवश्यक है।
आज अगर हम हिन्दी भाषा के वृहदोपयोगी स्वरूप की यदि चर्चा करें तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस भाषा का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है। संसार में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं पर अगर हम दृष्टि डालें तो हिन्दी दूसरे स्थान पर आती है। इस भाषा की उपयोगिता को देखते हुए संसार के लगभग छब्बीस देशों के विश्वविद्यालयों ने हिन्दी को अपने उच्चतर शिक्षा पाठ्यक्रम का हिस्सा बना लिया है। राष्ट्र भाषा होने का सम्मान तो हिन्दी को प्राप्त है ही साथ ही साथ जो सभी भाषायी शब्दों को आत्मसात करने की क्षमता हिन्दी में है, वह किसी अन्य भाषा में दिखाई नहीं देती। आज इसके तेजी से बढ़ते प्रभाव को देखकर महाशक्ति कहे जाने वाले अमेरिका ने भी अपने अधिकांश विश्वविद्यालयों में हिन्दी को एक विषय के रूप में मान्यता दे दी है। इस सबके पीछे एक कारण यह भी है कि अमेरिका को एशिया में भारत एक तेजी से पनपते बाजार के रूप में दिखाई देता है और वह जानता है कि यदि भारतीय व्यापार में अपनी साख मजबूत करनी है तो हिन्दी को आत्मसात किए बगैर यह सपना पूरा नहीं हो सकता।
विश्व मनोरंजन के क्षेत्र में भी हिन्दी फिल्म उद्योग का तेजी से विकास हो रहा है। हिन्दी भाषा में बनी फिल्में आज संसार के अनेक देशों में अपनी सफलता के परचम लहरा रही हैं जो इस बात का प्रमाण है कि आज हिन्दी केवल भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि विश्वस्तर पर अपनी लोकप्रियता स्थापित कर चुकी है। मीडिया के क्षेत्र में भी हिन्दी ने अपना प्रभाव काफी हद तक स्थापित कर लिया है। अनेक प्राइवेट हिन्दी टी० वी० चैनलों के आगमन ने हिन्दी भाषा को भी काफी लोकप्रियता प्रदान कर दी है। आज भारत के वे राज्य जो कभी हिन्दी विरोधी हुआ करते थे, वे हिन्दी टी० वी० सीरियलों का आनंद लेने में सबसे आगे दिखाई देते हैं। आज इस भाषा के पर्याप्त ज्ञान से विद्यार्थी किसी भी क्षेत्र में अपना सुनहरा भविष्य बना सकते हैं। आज हिन्दी भाषा का ज्ञान न केवल राष्ट्र और राष्ट्र भाषा के प्रति सम्मान है बल्कि एक सुनहरे भविष्य का भी आधार बन सकता है। आज हिन्दी फिल्मों या हिन्दी सीरियलों में अभिनय, मीडिया में संपादक, उद्घोषक या समाचार वादक या अनुवादक समेत कई ऐसे क्षेत्र हैं जो भाषा के जानकारों के लिए सफलता के द्वार खोल देते हैं। आज हिन्दी का अध्ययन और अध्यापन दोनों ही जहाँ एक ओर अनेक चुनौतियों से भरा हुआ है, वहीं दूसरी ओर इसमें प्रगति की असीम संभावनाएँ भी साफ दिखाई देती हैं।

(लेखक 'दि आसाम वैली स्कूल में हिंदी - विभाग के विभागाध्यक्ष हैं)

मूल स्रोत - http://www.rachanakar.org/2010/10/blog-post_1087.html

Image courtesy:http://google.com

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