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20 अप्रैल 2017

ग़मों में मुस्कुराना

परिन्दे आँधियों में आशियाना ढूँढ़ लेते हैं !
बंजारे कहीं भी इक ठिकाना ढूँढ़ लेते हैं !!
ग़मों की राह के हम भी मुसाफ़िर थे, मुसाफ़िर हैं,
ग़मों में भी मगर अब मुस्कुराना ढूँढ़ लेते हैं !!

बालकृष्ण द्विवेदी 'पंकज'
सम्पर्क सूत्र: +91-9651293983

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