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16 अगस्त 2017

जब तुम्हारा दुपट्टा सरकता था Jab tumhara dupatta sarakta tha (Tumne meri mohabbat)

Tumne meri mohabbat ko, jab tumhara dupatta saralta tha

"तूने मेरी मोहब्बत की गहराइयों को समझा ही नहीं सनम..!
तेरे बदन से जब दुपट्टा सरकता था हम नज़रें झुका लेते थे..!!"

Tuney meri mohabbat ki gahraiyon ko samjha hi nahi sanam!!
Terey badan se jab dupatta sarakta tha hum nazre jhuka lete they!!

   यूँ ही कहीं कुछ पढ़ रहा था और नज़र पड़ गयी इन पंक्तियों पर।

प्रथमदृष्टया कोई भी इसे उस सस्ती शेरो-शायरी की श्रेणी में रख सकता है जो ट्रैक्टर की ट्रॉलियों से लेकर बड़े बड़े ट्रकों के आगे-पीछे अक्सर लिखी मिल जाती हैं या चाट-पकौड़ी के ठेले या फिर किसी आशिक़ मिज़ाज नाई की दुकान के किसी कोने में लगी नेहा धूपिया टाइप हिरोइन के अर्धनग्न चित्र के साथ छपी हुई। लेकिन इन पंक्तियों को जब आप दोबारा पढ़ेंगे तो आपको एहसास हो जाएगा कि ये वास्तव में इन सबसे कुछ तो अलग हैं। इसकी भाव-भूमि वह है जिस तक आजकल के हनी सिंह टाइप लौंडे तो पहुँच ही नहीं सकते।


खैर, हम आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं आज के सोशल मीडिया के ज़माने की जहाँ हर कोई अपने आपको खुसरो, ज़ौक़, मीर, ग़ालिब और दुष्यंत कुमार समझता है। जहाँ पहली पंक्ति का तुक दूसरी पंक्ति से मिल जाना ही शायरी मानी जाती है और जहाँ कॉपी-पेस्ट की कला सीख लेना ही शायर बन जाने की गारण्टी है।

अभी कुछ ही दिन पहले की बात है हमारे एक फेसबुकिया मित्र की कालजयी पंक्तियाँ फ़ेसबुक वाल पर चमक रही थीं जो कुछ यूँ थीं-

"जाते जाते उसने कहा मुझसे,
मेरी बेवफाई से ही मर जाओगे या मार के जाऊँ।"

तिस पर सैकड़ों लाइक और कमेन्ट इन पंक्तियों की ख़ूबसूरती में चार-चाँद लगा रहे थे।
अब ऐसी ऐलानिया बेवफ़ाई वाली शायरी से कोई मरे न मरे लेकिन आज के दौर में ग़ालिब साहब ज़िंदा होते तो वो इसे पढ़कर ज़रूर दम तोड़ देते।

     ➢पढ़ें हिंदी का बेहतरीन प्रेम गीत-'रात आधी'

    उधर बड़े दिनों बाद पड़ोस के गाँव का गनेस मिल गया। अरे वही गनेसवा जिसका चक्कर कभी साथ के क्लास की पिरितिया के साथ खूब प्रचारित हुआ था। विज्ञापनों के दौर में हमने भी आधे-अधूरे मन से मान लिया था कि चलो भई होगा तो होगा! वैसे भी हमें सुबह शाम ग्राउण्ड के चक्कर लगाने के बाद और किसी चक्कर का न तो समय होता था और न हिम्मत। लेकिन मुझे इस बात में संशय जरूर था और इसका निराकरण उस दिन हुआ जिस दिन पिरितिया ने भरी क्लास में अपने हाथों की पूरी ताकत का इस्तेमाल गनेसवा के किचकिचे गाल पर किचकिचाकर किया था। चटाक की आवाज़ के साथ ही बेचारे के सपनों का महल भी चकनाचूर हो गया था उसी दिन। और यह प्रचार भी मैगी नूडल्स की तरह बंद हो गया। बेचारे की प्रेम कहानी बिना शुरू हुए ही ख़त्म हो गयी।
 
    गनेसवा बहुत दिनों बाद दिखा था। बेचारे की अंगूर जैसी आँखें सूख के किशमिश हुई जा रहीं थीं। बातों-बातों में पता चला गनेसवा भी आजकल लिख रहा है। मैंने कहा भई मुझे भी सुनाओ कुछ। बेचारे ने थोड़ा सकुचाते हुए सम्भवतः अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना कुछ यूँ पेश की-

"मै तेरा पीपल का पेड़,
और तू उस पे बैठी चुड़ैल..."

आगे सुनने की मेरी हिम्मत न रही।
  
    वैसे उम्र का सोलहवाँ बसंत देखते देखते सौ में से नब्बे लड़कों को शेर-ओ-सुखन का शौक चर्रा ही जाता है। कोई लिखता है, कोई लिखी लिखाई पढ़ता है लेकिन उनमें से दो-चार प्रतिशत ही ऐसे हिम्मतवाले होते हैं जो इसके जरिये, लंबे वाले रफ रजिस्टर के बीच नोट्स के आदान-प्रदान के बहाने अपनी भावनाओं का आदान-प्रदान कर पाते हैं। और इससे भी दुःखद बात यह कि उनमें से भी दो-चार प्रतिशत ही इतने भाग्यशाली होते हैं जिनका भाग्य गनेसवा के जैसा नहीं होता। मुझे तो आज तक नहीं समझ आया कि यह प्रतिशत इतना कम क्यों है। सरकार को इस तरफ ध्यान देना चाहिये।

ख़ैर हमें ध्यान इस बात पर देना है कि इस उम्र में लड़के जो लिखते हैं, पढ़ते हैं और पसंद करते हैं उसमें उनकी अपनी परिस्थितियाँ, प्रवृत्तियाँ, मनःस्थिति और विचारधारा झलकती है। और ऐसे परिदृश्य में कदाचित किसी षोडश वर्षीय छात्र के द्वारा लिखी गयी ये पंक्तियाँ "तूने मेरी मोहब्बत..." अंदर तक छू गयीं। याद आ गया प्रेम का वह उदात्त स्वरूप जो 'गुनाहों का देवता' के 'चन्दर' से विकृत होते हुए आज हनी सिंह के "आंटी पुलिस बुला लेगी तो यार तेरा कर लेगा हैंडल" में परिवर्तित हो चुका है।

  ऐसे समय में जबकि प्रेम गले के नीचे से शुरू होकर पैरों के ऊपर ही कहीं ख़त्म हो जाता है, ये पंक्तियाँ बहुत ही प्रासंगिक हैं। प्रेम की परिणति क्या होती हैं, कैसे होती है? हमें उससे नहीं मतलब। हमें मतलब है तो उस मनोभावना से, उस आह्लाद से, उस मखमली एहसास से जो इंसान को इंसानियत सिखा देता है, जो ज़िन्दगी को ज़िंदादिली से जीने का सलीका सिखा देता है और जो ज़मीन-ओ-आसमाँ की हर एक शै को ख़ूबसूरत बना देता है।

प्रेम जिसमें कोई अपेक्षा नहीं, कोई शिकायत नहीं। जिसमें ज़िन्दगी के सारे अँधेरे मिट जाते हैं। होती है तो हर तरफ़ एक रौशनी, एक खुशबू, एक ताज़गी। जीना है तो इस एहसास में जियें, सब लोग जियें; ज़िन्दगी वाक़ई बहुत खूबसूरत है।

किसी ने क्या ख़ूब लिखा है-
अक़्ल से सिर्फ़ ज़ेहन रोशन था,
इश्क़ ने दिल में रोशनी की है ।।
….............….......
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बालकृष्ण द्विवेदी 'पंकज'
सम्पर्क-9651293983

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